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jainandsdiary 's review for:
Cycle Ki Chain
by Amritesh.
साइकिल की चैन कहानी है राहुल और अंजली की!
नाम कुछ ज़्यादा ही सुने सुने लगते हैं।
फिल्मों में इन नामों को इतनी बार देखा और सुना गया है की अब ये फीके फीके लगते हैं।
लेकिन क्या कहानी भी ऐसी ही है, फीकी फीकी?
वैसे इस कहानी को इन नामों से अलग रखते हुए देखे तो कहानी काफ़ी उत्कृष्ट तरीके से लिखी गई है।
हर बचपन का प्यार (आप इसे बसपन भी पढ़ सकते है, बस अंतर इतना है कि कहानी के किरदारों में परिपक्वता है) मृगतृष्णा हो ज़रूरी नहीं। कुछ किरदार अपने आप में गहराइयां ले आते है। और अगर न ला पाए, तो परिस्थितियां इस बात की पूर्ति कर देती है। बस कुछ ऐसा ही समझ लीजिए इस कहानी के किरदारों के साथ भी।
बचपन का प्यार का बड़े होकर भी वैसा ही रहता है या कुछ बदल सा जाता है? बचपन का प्यार प्यार होता भी है या सिर्फ आकर्षण बनकर रह जाता है? क्या हर कहानी में अगर घर की आर्थिक स्थिति और जाति अलग हो, तो क्या कहानी वैसी ही घिसी पीटी हो जाती है क्या?
वैसे इन सवालों के जवाब जानने के लिए तो आपको कहानी पढ़नी पढ़ेगी। मैं तो सिर्फ़ अपना किस्सा इस कहानी के हिस्सों के हिसाब से बता सकता हूं। कहानी अच्छी है या यूं कहा जाए साधारण कहानी अच्छी तरह से लिखी गई है तो बेहतर होगा। भाषा काफ़ी सरल है एवं इस वजह से पढ़ना बहुत ही आसान रहा। पूरी कहानी वैसे तो "फील गुड" वाले तरीके से लिखी गई है, लेकिन अंतिम कुछ भाग आपको भावुक बनाने के लिए पर्याप्त है। और वैसे ये "नई वाली हिंदी" की कहानी है, तो बिना ज्यादा कुछ बोले भी आप समझ सकते है कि कहानी से क्या अपेक्षा रखी जाए।
बाकी हां, इतना ज़रूर है, कि कहानी काफी साधारण है और कुछ हद तक पूर्वकथनीय भी, तो ऐसा कुछ आपको लगेगा नहीं जो आपके रोंगटे खड़े कर दे। अगर आप एक ऐसी कहानी पढ़ना चाहते है, जो आपको सुकून दे और आप शांति से बिना अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाए पढ़ सके, तो ये कहानी आपके लिए है। Storytel पर इसे सुनना काफ़ी अच्छा अनुभव रहा। नैरेटर साहब, जिन्हें कथा वाचक ही कहा जाए तो बेहतर होगा ने इस कहानी को बहुत ही बढ़िया तरीके से प्रस्तुत किया है। बाकी हां, कहानी सुनकर मज़ा आ गया। साधारण सी कहानी में अमित जी की आवाज़ ने जान डाल दी है।
Rating: 4/5 (story), 5/5 (narration)
नाम कुछ ज़्यादा ही सुने सुने लगते हैं।
फिल्मों में इन नामों को इतनी बार देखा और सुना गया है की अब ये फीके फीके लगते हैं।
लेकिन क्या कहानी भी ऐसी ही है, फीकी फीकी?
वैसे इस कहानी को इन नामों से अलग रखते हुए देखे तो कहानी काफ़ी उत्कृष्ट तरीके से लिखी गई है।
हर बचपन का प्यार (आप इसे बसपन भी पढ़ सकते है, बस अंतर इतना है कि कहानी के किरदारों में परिपक्वता है) मृगतृष्णा हो ज़रूरी नहीं। कुछ किरदार अपने आप में गहराइयां ले आते है। और अगर न ला पाए, तो परिस्थितियां इस बात की पूर्ति कर देती है। बस कुछ ऐसा ही समझ लीजिए इस कहानी के किरदारों के साथ भी।
बचपन का प्यार का बड़े होकर भी वैसा ही रहता है या कुछ बदल सा जाता है? बचपन का प्यार प्यार होता भी है या सिर्फ आकर्षण बनकर रह जाता है? क्या हर कहानी में अगर घर की आर्थिक स्थिति और जाति अलग हो, तो क्या कहानी वैसी ही घिसी पीटी हो जाती है क्या?
वैसे इन सवालों के जवाब जानने के लिए तो आपको कहानी पढ़नी पढ़ेगी। मैं तो सिर्फ़ अपना किस्सा इस कहानी के हिस्सों के हिसाब से बता सकता हूं। कहानी अच्छी है या यूं कहा जाए साधारण कहानी अच्छी तरह से लिखी गई है तो बेहतर होगा। भाषा काफ़ी सरल है एवं इस वजह से पढ़ना बहुत ही आसान रहा। पूरी कहानी वैसे तो "फील गुड" वाले तरीके से लिखी गई है, लेकिन अंतिम कुछ भाग आपको भावुक बनाने के लिए पर्याप्त है। और वैसे ये "नई वाली हिंदी" की कहानी है, तो बिना ज्यादा कुछ बोले भी आप समझ सकते है कि कहानी से क्या अपेक्षा रखी जाए।
बाकी हां, इतना ज़रूर है, कि कहानी काफी साधारण है और कुछ हद तक पूर्वकथनीय भी, तो ऐसा कुछ आपको लगेगा नहीं जो आपके रोंगटे खड़े कर दे। अगर आप एक ऐसी कहानी पढ़ना चाहते है, जो आपको सुकून दे और आप शांति से बिना अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाए पढ़ सके, तो ये कहानी आपके लिए है। Storytel पर इसे सुनना काफ़ी अच्छा अनुभव रहा। नैरेटर साहब, जिन्हें कथा वाचक ही कहा जाए तो बेहतर होगा ने इस कहानी को बहुत ही बढ़िया तरीके से प्रस्तुत किया है। बाकी हां, कहानी सुनकर मज़ा आ गया। साधारण सी कहानी में अमित जी की आवाज़ ने जान डाल दी है।
Rating: 4/5 (story), 5/5 (narration)